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Maximum Thrust Provided by Iron Man’s Suit
This Paper was my entry in a Science Fiction Paper Presentation Competition at Tryst, IIT Delhi.
Abstract:
In this Analysis done on Iron Man’s Mark VI suit used in the Movies Iron Man 2 and The Avengers we try to find out exactly how much thrust can those shiny little repulsors provide. Assuming that Tony Stark used the full thrust from his suit when trying to “jump-start” S.H.I.E.L.D’s Helicarrier’s Ducted rotors, we will first provide an analysis of the thrust provided by a single rotor on the helicarrier, and then calculate the thrust of Iron Man’s Repulsor Beam. And subsequently deduce the amount of power his arc reactor uses.

Rage Against Rape!
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तेरे अन्दर नहीं है राम बसा
वो पुतला जला हुआ था,
वहीँ राख में पड़ा हुआ था,
फिर भी उसपर एक मुस्कान थी बिछी,
जैसे हो हमारा उपहास कर रही।
मेरे थे ये कान बज रहे,
या था ये शराब का असर?
लंकापति रावन पुतले से निकल,
बोल रहे थे मुझे हंस-हंस कर:
“तूने राम से सच न सीखा,
ना सीखी वचनों की गहराई।
बस ये है याद तुझे,
मर्यादा पे आंच आते ही,
झोक दो आग में अपनी बेहेन, बेटी, या लुगाई।”
“दिवाली पे राम घर थे लौटे,
पर इस कलयुग में उन्हें मिले जगह कहाँ!
राम जगह तेरे दिल में ढूँढ़ते,
तू पीछा लक्ष्मी का कर रहा।”
“राम ने शबरी के फल थे खाए,
राम ने गुहा को भाई भी माना,
फिर भी धर्म के नाम पर,
तुझे जातिवाद ही याद आया।”
“राम नहीं जीता है अब तक,
राम ना कभी जीतेगा!
राम तो तभी हार गया जब,
तूने मुझे भी पीछे छोड़ दिया!”
“मेरे तो केवल दस चेहरे थे,
तेरे तो हैं सैंकड़ों-हज़ार,
हर मखौटे के पीछे मखौटा, अस्तित्व भी तेरा है एक नकाब।”
“तू खुद को दूसरों में ढूँढता है,
तू अन्दर से है खोकला,
काल के हाथों में तू एक पुतला है,
तेरे अन्दर नहीं है भगवान बसा।
तेरे अन्दर नहीं है राम बसा।
तेरे अन्दर नहीं श्री राम बसा।।”
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Wish You All a very Happy and Meaningful Diwali! (I hope I didn’t offend any Internet Hindus!
)
कैसे कह दूँ, अलविदा?
अगर जुदाई ही सच्चाई है,
तो ऐसे सच का क्या फायदा,
अगर दर्द मीत की रीत है,
तो अच्छा मैं अकेला खड़ा।
मैं मासूमियत में महफूज़ था,
तब रिश्तों पे विश्वास था।
अब ना रहे रिश्ते हैं,
ना रहा विश्वास है,
सब कहीं है चल पड़े,
कोई ना बचा पास है।
ऐ राही हमसफ़र ना कह मुझे,
अगर अलग तेरा रास्ता।
इस बसते में काफी बोझ है,
इस बोझ को तू ना बढ़ा…
ध्रुवतारा…
Dedicated to,
My best friend, Jady,
Who also happens to be the biggest fan of my poems.
Happy Birthday Dear,
Hope you like it!
बंजारों सी इस ज़िन्दगी में,
सब कुछ था बदलता रहा,
न कभी दोस्ती का मौका मिला,
न कभी बता सका किसी को अपना गिला -शिकवा।
जब बेमतलब सा लगने लगा था सब,
जब मेरा पूरा ज़ोर लगाने पर भी,
वो गद्दार आंसू, बाहर आ जाता था तब,
जब अकेलापन सा महसूस किया इस दुनिया में कभी,
तू ध्रुव तारे सी अटल, मेरे साथ बनी रही ..।।
चमकती-दमकती, आशा जगाती हुई,
तेरी रौशनी जगा देती मुझमे हौसला अजब।
बदलाव के सागर में सब थे बह गए,
लेकिन जब भी सर उठाया,
उस ही जगह पर तुझे पाया तब।
कोई तारा टिमटिमाता,
हर अमावस, चाँद भी दगा दे जाता,
लेकिन तेरी चमक का तेज़ न बदला कभी।
सब ग्रह-नक्षत्र अपनी जगह बदलते,
पर तुझको पाया आसमान में हर पल वहीँ।
बस ऐसे ही साथ निभाते रहना तू,
की ज़िन्दगी के बाद जब आत्मा परलोक को जाये,
कह दूँ चित्रगुप्त को बुलंद आवाज़ में,
की मेरा आखरी स्थान, ध्रुवतारे के पास बनाए !!
खाली बोतल…
उस शाम में भी था नशा,
उस जाम में भी था नशा,
संगीत में सब लीन थे,
था हर कोई झूम रहा,
था तो नशे में मैं भी,
पर मेरी शराब कुछ और थी,
जिस लड़की को सालों से देख रहा था,
आज उसमे बात ही कुछ और थी,
आया था मौका, की नशे में मैं भी गुम हो जाऊं,
नाचते-गाते, हस्ते-खेलते, कहीं बीच में अपने दिल की बात फर्माऊँ,
पर विधि का विधान देखो,
की था मैं जिसकी धुन में नाच रहा,
उसकी नज़रें कहीं और थी,
रह गया था दिल एक और रात प्यासा,
और बदकिस्मती से अबतक, इसकी आदत सी हो चुकी थी…
Kaash…
If only someone had told me that it only gets worse from here,
If only, I had cherished those moments, then and there,
If only, I could relive that past again,
But I can’t,
and life is losing rhythm just like this poem…


