Late Night Diaries: Page 1 [Declassified]

Aaj kaha ek sajjan ne mujhko,
Ki jeena hai to pyaar karo,
[Sirf pyaar na karo, balki dil bhi tudwao],

Baat to unki sahi hai,
Par meri dikkat yehi hai,
ki pyaar ka matlab mujhe pata nhi,
Aur ye bollywood aur kitaabi cherry blossom mujhe bhaata nahin,
Attraction aur dosti samajh aate hain,
Uske aage badhne ki mujhme himmat nhin.

Kisi ki aankhon me kaise dekhun main,
khudse sheeshe me nazren milti nhi mujhse,
Kaise kisi se ikraar karun, jab dooba hun kal ki fikr mein,

Pyaar to karna hai boss,
Par nakleepan nhi chahiye,
Dil mera sau bar toot jaaye, ye to chalega,
Kisi aur ko 1 aansu bhi aaya to mera dil mujhe kabhi maaf nhi karega…

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तेरे अन्दर नहीं है राम बसा

वो पुतला जला हुआ था,
वहीँ राख में पड़ा हुआ था,
फिर भी उसपर एक मुस्कान थी बिछी,
जैसे हो हमारा उपहास कर रही।

मेरे थे ये कान बज रहे,
या था ये शराब का असर?
लंकापति रावन पुतले से निकल,
बोल रहे थे मुझे हंस-हंस कर:

“तूने राम से सच न सीखा,
ना सीखी वचनों की गहराई।
बस ये है याद तुझे,
मर्यादा पे आंच आते ही,
झोक दो आग में अपनी बेहेन, बेटी, या लुगाई।”

“दिवाली पे राम घर थे लौटे,
पर इस कलयुग में उन्हें मिले जगह कहाँ!
राम जगह तेरे दिल में ढूँढ़ते,
तू पीछा लक्ष्मी का कर रहा।”

“राम ने शबरी के फल थे खाए,
राम ने गुहा को भाई भी माना,
फिर भी धर्म के नाम पर,
तुझे जातिवाद ही याद आया।”

“राम नहीं जीता है अब तक,
राम ना कभी जीतेगा!
राम तो तभी हार गया जब,
तूने मुझे भी पीछे छोड़ दिया!”

“मेरे तो केवल दस चेहरे थे,
तेरे तो हैं सैंकड़ों-हज़ार,
हर मखौटे के पीछे मखौटा,                                                                                                अस्तित्व भी तेरा है एक नकाब।”

“तू खुद को दूसरों में ढूँढता है,
तू अन्दर से है खोकला,
काल के हाथों में तू एक पुतला है,
तेरे अन्दर नहीं है भगवान बसा।
तेरे अन्दर नहीं है राम बसा।
तेरे अन्दर नहीं श्री राम बसा।।”

Rama Exiled Again

Rama Exiled!

~~~

Wish You All a very Happy and Meaningful Diwali! (I hope I didn’t offend any Internet Hindus! :P)

 

कैसे कह दूँ, अलविदा?

अगर जुदाई ही सच्चाई है,
तो ऐसे सच का क्या फायदा,
अगर दर्द मीत की रीत है,
तो अच्छा मैं अकेला खड़ा।

मैं मासूमियत में महफूज़ था,
तब रिश्तों पे विश्वास था।
अब ना रहे रिश्ते हैं,
ना रहा विश्वास है,
सब कहीं है चल पड़े,
कोई ना बचा पास है।

ऐ राही हमसफ़र ना कह मुझे,
अगर अलग तेरा रास्ता।
इस बसते में काफी बोझ है,
इस बोझ को तू ना बढ़ा…

ध्रुवतारा…

Dedicated to,

My best friend, Jady,

Who also happens to be the biggest fan of my poems.

Happy Birthday Dear,

Hope you like it!

बंजारों सी इस ज़िन्दगी में,
सब कुछ था बदलता रहा,
न  कभी दोस्ती का मौका मिला,
न कभी बता सका किसी को अपना गिला -शिकवा।
जब बेमतलब सा लगने लगा था सब,
जब मेरा पूरा ज़ोर लगाने पर भी,
वो गद्दार आंसू, बाहर आ जाता था तब,
जब अकेलापन सा महसूस किया इस दुनिया में कभी,
तू ध्रुव तारे सी अटल, मेरे साथ बनी रही ..।।

चमकती-दमकती, आशा जगाती हुई,
तेरी रौशनी जगा देती मुझमे हौसला अजब।
बदलाव के सागर में सब थे बह गए,
लेकिन जब भी सर उठाया,
उस ही जगह पर तुझे पाया तब।
कोई तारा टिमटिमाता,
हर अमावस, चाँद भी दगा दे जाता,
लेकिन तेरी चमक का तेज़ न बदला कभी।
सब ग्रह-नक्षत्र अपनी जगह बदलते,
पर तुझको पाया आसमान में हर पल वहीँ।

बस ऐसे ही साथ निभाते रहना तू,
की ज़िन्दगी के बाद जब आत्मा परलोक  को जाये,
कह दूँ चित्रगुप्त को बुलंद आवाज़ में,
की मेरा आखरी स्थान, ध्रुवतारे के पास बनाए !!

खाली बोतल…

उस शाम में भी था नशा,
उस जाम में भी था नशा,

संगीत में सब लीन थे,
था हर कोई झूम रहा,

था तो नशे में मैं भी,
पर मेरी शराब कुछ और थी,

जिस लड़की को सालों से देख रहा था,
आज उसमे बात ही कुछ और थी,

आया था मौका, की नशे में मैं भी गुम हो जाऊं,
नाचते-गाते, हस्ते-खेलते, कहीं बीच में अपने दिल की बात फर्माऊँ,

पर विधि का विधान देखो,

की था मैं जिसकी धुन में नाच रहा,
उसकी नज़रें कहीं और थी,

रह गया था दिल एक और रात प्यासा,
और बदकिस्मती से अबतक, इसकी आदत सी हो चुकी थी…

 खाली बोतल...

A Puppet Show

To control the universe,

That was my dream.

So I rose above all else,

At least that’s what it seemed.

I saw the world as a puppet show,

Where I was the grand puppeteer.

Tried to play God,

Pulled strings everywhere.

I never knew when it happened,

When the master became the slave,

When the strings I was pulling,

Morphed into chains.

It all went out of control,

The chains were clenching me,

The puppeteer became the puppet,

In the hands of God almighty.

An untameable wild horse he is,

And not some dumb deity,

He is the blessing called free will,

That and that alone is his true identity.

Captain of a Sinking Ship

The gleaming deck, the chirping birds,

Ah… They so seem to mock me,

The things I promised and all my dreams,

to think that all’s a fallacy,

My family is proudly on-board,

oblivious to the fate that awaits them,

My friends are consoling me,

Unaware that I am just a broken stem.

I want to curse those, who have sailed ahead,

who show sympathetic gestures, but don’t really give a heck,

just one thing keeps me from saying any ill of them,

that my beloved is safe and sound, as long as she is with one of them.

The sirens are wailing, Cries of ‘Abandon Ship’ still louder,

And there I was weeks back, thinking I couldn’t be any prouder.

Is it a sense of duty or is it the oozing shame?

What is it, that’s still allowing me to get a grip?

Am I going to heaven or am I going to hell?

Is there any respite, for me, the captain of a sinking ship?