कैसे कह दूँ, अलविदा?

अगर जुदाई ही सच्चाई है,
तो ऐसे सच का क्या फायदा,
अगर दर्द मीत की रीत है,
तो अच्छा मैं अकेला खड़ा।

मैं मासूमियत में महफूज़ था,
तब रिश्तों पे विश्वास था।
अब ना रहे रिश्ते हैं,
ना रहा विश्वास है,
सब कहीं है चल पड़े,
कोई ना बचा पास है।

ऐ राही हमसफ़र ना कह मुझे,
अगर अलग तेरा रास्ता।
इस बसते में काफी बोझ है,
इस बोझ को तू ना बढ़ा…

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खाली बोतल…

उस शाम में भी था नशा,
उस जाम में भी था नशा,

संगीत में सब लीन थे,
था हर कोई झूम रहा,

था तो नशे में मैं भी,
पर मेरी शराब कुछ और थी,

जिस लड़की को सालों से देख रहा था,
आज उसमे बात ही कुछ और थी,

आया था मौका, की नशे में मैं भी गुम हो जाऊं,
नाचते-गाते, हस्ते-खेलते, कहीं बीच में अपने दिल की बात फर्माऊँ,

पर विधि का विधान देखो,

की था मैं जिसकी धुन में नाच रहा,
उसकी नज़रें कहीं और थी,

रह गया था दिल एक और रात प्यासा,
और बदकिस्मती से अबतक, इसकी आदत सी हो चुकी थी…

 खाली बोतल...

Captain of a Sinking Ship

The gleaming deck, the chirping birds,

Ah… They so seem to mock me,

The things I promised and all my dreams,

to think that all’s a fallacy,

My family is proudly on-board,

oblivious to the fate that awaits them,

My friends are consoling me,

Unaware that I am just a broken stem.

I want to curse those, who have sailed ahead,

who show sympathetic gestures, but don’t really give a heck,

just one thing keeps me from saying any ill of them,

that my beloved is safe and sound, as long as she is with one of them.

The sirens are wailing, Cries of ‘Abandon Ship’ still louder,

And there I was weeks back, thinking I couldn’t be any prouder.

Is it a sense of duty or is it the oozing shame?

What is it, that’s still allowing me to get a grip?

Am I going to heaven or am I going to hell?

Is there any respite, for me, the captain of a sinking ship?