तेरे अन्दर नहीं है राम बसा

वो पुतला जला हुआ था,
वहीँ राख में पड़ा हुआ था,
फिर भी उसपर एक मुस्कान थी बिछी,
जैसे हो हमारा उपहास कर रही।

मेरे थे ये कान बज रहे,
या था ये शराब का असर?
लंकापति रावन पुतले से निकल,
बोल रहे थे मुझे हंस-हंस कर:

“तूने राम से सच न सीखा,
ना सीखी वचनों की गहराई।
बस ये है याद तुझे,
मर्यादा पे आंच आते ही,
झोक दो आग में अपनी बेहेन, बेटी, या लुगाई।”

“दिवाली पे राम घर थे लौटे,
पर इस कलयुग में उन्हें मिले जगह कहाँ!
राम जगह तेरे दिल में ढूँढ़ते,
तू पीछा लक्ष्मी का कर रहा।”

“राम ने शबरी के फल थे खाए,
राम ने गुहा को भाई भी माना,
फिर भी धर्म के नाम पर,
तुझे जातिवाद ही याद आया।”

“राम नहीं जीता है अब तक,
राम ना कभी जीतेगा!
राम तो तभी हार गया जब,
तूने मुझे भी पीछे छोड़ दिया!”

“मेरे तो केवल दस चेहरे थे,
तेरे तो हैं सैंकड़ों-हज़ार,
हर मखौटे के पीछे मखौटा,                                                                                                अस्तित्व भी तेरा है एक नकाब।”

“तू खुद को दूसरों में ढूँढता है,
तू अन्दर से है खोकला,
काल के हाथों में तू एक पुतला है,
तेरे अन्दर नहीं है भगवान बसा।
तेरे अन्दर नहीं है राम बसा।
तेरे अन्दर नहीं श्री राम बसा।।”

Rama Exiled Again

Rama Exiled!

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Wish You All a very Happy and Meaningful Diwali! (I hope I didn’t offend any Internet Hindus! :P)

 

कैसे कह दूँ, अलविदा?

अगर जुदाई ही सच्चाई है,
तो ऐसे सच का क्या फायदा,
अगर दर्द मीत की रीत है,
तो अच्छा मैं अकेला खड़ा।

मैं मासूमियत में महफूज़ था,
तब रिश्तों पे विश्वास था।
अब ना रहे रिश्ते हैं,
ना रहा विश्वास है,
सब कहीं है चल पड़े,
कोई ना बचा पास है।

ऐ राही हमसफ़र ना कह मुझे,
अगर अलग तेरा रास्ता।
इस बसते में काफी बोझ है,
इस बोझ को तू ना बढ़ा…