कैसे कह दूँ, अलविदा?

अगर जुदाई ही सच्चाई है,
तो ऐसे सच का क्या फायदा,
अगर दर्द मीत की रीत है,
तो अच्छा मैं अकेला खड़ा।

मैं मासूमियत में महफूज़ था,
तब रिश्तों पे विश्वास था।
अब ना रहे रिश्ते हैं,
ना रहा विश्वास है,
सब कहीं है चल पड़े,
कोई ना बचा पास है।

ऐ राही हमसफ़र ना कह मुझे,
अगर अलग तेरा रास्ता।
इस बसते में काफी बोझ है,
इस बोझ को तू ना बढ़ा…